दिल्ली–अमृतसर–कटरा एक्सप्रेसवे: किसानों की चिंताएँ और विकास का सवाल

दिल्ली–अमृतसर–कटरा एक्सप्रेसवे लगभग 650 किमी लंबा है। यह एक्सप्रेसवे बहादुरगढ़ से शुरू होगा। इससे जुड़े अन्य मार्गों के लिए रानीखेड़ा गाँव के पास राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) से एक संपर्क मार्ग निकलेगा और जसौर खेड़ी गाँव के पास कुंडली–मानेसर–पलवल (केएमपी) एक्सप्रेसवे से जुड़ जाएगा। इसके बाद यह हरियाणा और पंजाब से होते हुए जम्मू-कश्मीर के कटरा में जाकर समाप्त होगा। इस परियोजना से दिल्ली के सात गाँव—रानीखेड़ा, कंझावला, निजामपुर, लाड़पुर, जौंती, सावदा और गढ़ी—के किसान प्रभावित होंगे।

दिल्ली में पहले से ही किसानों के पास नाममात्र की जमीन बची है। विकास के नाम पर विभिन्न परियोजनाओं के तहत सरकार पहले ही इन किसानों की काफी जमीन का अधिग्रहण कर चुकी है। इस बार जब किसानों को अपनी जमीन के अधिग्रहण की सूचना मिली तो वे नाराज हो गए। उनकी नाराजगी का सबसे बड़ा कारण यह है कि दिल्ली में लंबे समय से कृषि भूमि का सर्किल रेट नहीं बढ़ाया गया है।

वर्तमान में करीब दो दशक पुराने सर्किल रेट दिए जा रहे हैं जो एक एकड़ भूमि का 53 लाख रुपये है, जबकि उसका बाजार मूल्य करोड़ों रुपये है। किसानों ने बताया कि दिल्ली के आसपास के इलाकों—गुरुग्राम, नोएडा और बहादुरगढ़ में भूमि अधिग्रहण का मुआवजा दिल्ली की तुलना में अधिक मिल रहा है।

भूमि अधिग्रहण और सर्किल रेट के मुद्दे पर दिल्ली देहात के किसानों ने 2 अगस्त को कंझावला में किसान पंचायत का आयोजन किया। पंचायत में प्रमुख रूप से यह कहा गया कि पुराने सर्किल रेट पर सरकार को भूमि अधिग्रहण नहीं करने दिया जाएगा। किसानों ने कहा कि सरकार द्वारा लगाए गए पोल वे नहीं उखाड़ेंगे, लेकिन निर्माण कार्य भी शुरू नहीं होने देंगे।

सरकार ने घोषणा की है कि दिल्ली–कटरा एक्सप्रेसवे के बचे हुए कार्य सितंबर के अंत तक शुरू कर पूरे किए जाएंगे। इसके लिए हरियाणा में भूमि अधिग्रहण का काम भी शुरू हो चुका है।

किसानों ने चिंता जताई कि यदि सरकार उनकी जमीन ले लेगी और उनके बच्चों को रोजगार भी नहीं मिलेगा, तो उनके भविष्य का क्या होगा? उनकी मांग है कि सरकार सर्किल रेट बढ़ाए, ताकि मिलने वाले मुआवजे से वे अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर सकें।

संयुक्त किसान मोर्चा के महावीर सिंह नीलवाल ने कहा कि केवल सर्किल रेट बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने पर्यावरण के नुकसान और दिल्ली में तेजी से बढ़ती आबादी पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि बाहरी आबादी का दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे लोगों को पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिल पा रही हैं। विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश किया जा रहा है।

पंचायत का संचालन कर रहे विजय मान ने कहा कि सरकार आंदोलन को कमजोर करने के लिए किसानों के बीच से ही नकली नेताओं को खड़ा करती है। इसलिए ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जो भी प्रधान या नेता किसानों के बीच आए और कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करे, वही उनका वास्तविक नेता होगा। उन्होंने पिछले आंदोलनों में दलाली और फर्जी नेतृत्व के अनुभवों से सीख लेने की भी बात कही।

सत्येंद्र, जो बिजली विभाग द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर चुके हैं और सफलता हासिल कर चुके हैं, ने जोर देकर कहा कि किसानों को एक मजबूत समिति बनानी होगी और वही समिति आंदोलन का नेतृत्व करे, ताकि संघर्ष संगठित और प्रभावी बन सके।

अंत में सातों गाँवों की 30 सदस्यीय समिति का गठन किया गया। यह समिति अपने-अपने गाँवों में आंदोलन को मजबूत करेगी, लोगों से राय लेगी और सरकार से सर्किल रेट की मांग को अंतिम रूप देगी। साथ ही, लोगों को अदालती मामलों से बचाने के लिए एक कानूनी टीम भी गठित की जाएगी, जो सरकारी दमन की स्थिति में किसानों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराएगी।

पंचायत में यह भी तय किया गया कि 16 अगस्त तक किसान अपने-अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से मिलकर अपनी बात रखेंगे और उनसे लोकसभा तथा विधानसभा में इस मुद्दे को उठाने की मांग करेंगे। यदि 16 अगस्त तक किसानों की मांगों पर सुनवाई नहीं होती है, तो आगे के आंदोलन की रूपरेखा यही समिति तय करेगी। इसमें यूआर-2 जाम करने से लेकर जंतर-मंतर पर धरना देने जैसे कार्यक्रम भी शामिल हो सकते हैं।

पंचायत की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि कई वक्ताओं ने जेन-जी आंदोलन का उल्लेख किया। उन्होंने 36 दिनों के भीतर सरकार को झुकाने वाले उस आंदोलन की सोशल मीडिया रणनीति की सराहना की। किसानों के घरों में मौजूद जेन-जी युवाओं से अपील की गई कि वे पंचायत के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करें, ताकि किसानों की बात व्यापक जनता और सरकार तक पहुँच सके।

दिल्ली–कटरा एक्सप्रेसवे से किसका लाभ?

सरकार का तर्क है कि इस एक्सप्रेसवे के बनने से दिल्ली, अमृतसर और कटरा के बीच यात्रा में लगभग 5–6 घंटे की बचत होगी। इस मार्ग पर वाहन 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकेंगे। समय की बचत के अलावा सरकार के पास इस परियोजना के पक्ष में बहुत कम तर्क दिखाई देते हैं।

कटरा जाने वाले अधिकांश श्रद्धालु आज भी ट्रेन से यात्रा करते हैं, क्योंकि यह अपेक्षाकृत आरामदायक, सुरक्षित और किफायती माध्यम है। यदि सरकार वास्तव में लोगों को लाभ पहुँचाना चाहती है, तो कटरा के लिए ट्रेनों की संख्या बढ़ा सकती है और उनकी गति में सुधार कर सकती है। लेकिन इसके बजाय वह एक्सप्रेसवे निर्माण को प्राथमिकता दे रही है।

एक्सप्रेसवे का सबसे अधिक लाभ पूंजीपति वर्ग को मिलता है, क्योंकि उनके माल का परिवहन कम समय और कम लागत में हो पाता है। बेहतर सड़कें तेज रफ्तार परिवहन और लग्जरी कारों के उपयोग को भी बढ़ावा देती हैं। इसका लाभ मुख्यतः बड़े उद्योगों और पूंजीपति वर्ग को मिलेगा, जबकि इसकी कीमत किसान और आम जनता चुकाएंगे।

बजट के आँकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में राजमार्ग निर्माण पर सरकारी खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2012–13 में इस मद पर कुल बजट का लगभग 1.8 प्रतिशत खर्च होता था, जबकि 2025–26 में यह बढ़कर 5.8 प्रतिशत हो गया। इसके विपरीत दिल्ली और अन्य शहरों की आंतरिक सड़कों की स्थिति आज भी खराब बनी हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार का ध्यान मुख्यतः उन सड़कों पर है, जिनसे बड़े पैमाने पर माल ढुलाई होती है।

इसी संदर्भ में शिक्षा के बजट का उदाहरण भी दिया जा सकता है। 2013–14 में शिक्षा पर कुल बजट का लगभग 4.6 प्रतिशत खर्च होता था, जो 2025–26 में घटकर लगभग 2.5 प्रतिशत रह गया। इससे यह तर्क सामने आता है कि सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की अपेक्षा राजमार्ग निर्माण को अधिक प्राथमिकता दे रही है।

दिल्ली–कटरा एक्सप्रेसवे से संभावित नुकसान

  • हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि सड़क निर्माण में चली जाएगी, जिससे किसानों की आजीविका और कृषि उत्पादन प्रभावित होगा।
  • एक्सप्रेसवे निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होगी, जिसका प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण, जैव विविधता और पक्षियों के आवास पर पड़ेगा।
  • यह मार्ग कई प्राकृतिक क्षेत्रों से होकर गुजरता है। तेज यातायात के कारण वन्यजीवों के आवागमन में बाधा आएगी और सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ेगा।
  • एक्सप्रेसवे वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर सकता है, जिससे जलभराव और स्थानीय स्तर पर गंदगी की समस्या बढ़ सकती है।

इस प्रकार यह एक्सप्रेसवे कुछ लोगों के लिए लाभकारी हो सकता है, लेकिन बड़ी संख्या में किसानों, पर्यावरण और स्थानीय समाज के लिए इसके गंभीर दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

यह लड़ाई केवल दिल्ली के किसानों की नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की है जो जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा कॉरपोरेट हितों के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। यह उन किसानों की भी लड़ाई है, जिनकी जमीन विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर अधिग्रहित की जा रही है।

यह संघर्ष उन पर्यावरण प्रेमियों का भी है, जो प्रकृति को हो रहे नुकसान के प्रति समाज को जागरूक कर रहे हैं। साथ ही, यह वन्यजीवों और जैव विविधता के संरक्षण से जुड़े लोगों का भी संघर्ष है। इसलिए आवश्यकता है कि समाज के सभी वर्ग एकजुट होकर दिल्ली के किसानों के आंदोलन का समर्थन करें और कॉरपोरेट-प्रेरित विकास मॉडल का विरोध करें।

(सुनील कुमार शोधकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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